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क्या है राष्ट्रीय गौरव ‘सेंगोल’ और क्यों हो रही है इसकी इतनी चर्चा जानें इससे जुड़ा इतिहास!

नई दिल्ली : अभी कुछ दिनों से देश में एक शब्द खूब चर्चा में बना हुआ है- ‘सेंगोल’ हर कोई इसे सेनगोल लिख/बोल रहा है तो कोई सिनगोल या फिर सिंगोल। बहुत लोग ऐसे भी हैं ये समझ ही नहीं पा रहे कि आख़िर माजरा क्या है? तो हम ने सोचा कि क्यों न आपके लिए और तमाम जिज्ञासु लोगों की जिज्ञासा के समाधान के लिए सेंगोल को समझा जाए।

सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि ‘सेंगोल‘ किसी अनजान दुनिया से आया कोई अनूठा यंत्र नहीं है बल्कि यदि इसके बहुप्रचलित नाम ‘राजदंड’ का उल्लेख किया जाए तो आसानी से समझ में आ जाता है। राजदंड यानि देश/राज्य की न्यायपूर्ण सत्ता का प्रतीक। अक्सर ऐतिहासिक/धार्मिक सीरियलों और पुरानी फिल्मों में आमतौर पर शासकों के साथ यह दिखाया जाता था। समझने के लिए हम इसे खेलों में मशाल की तरह लोकतंत्र की मशाल भी कह सकते हैं।

28 मई को नई संसद भवन में होगा स्थापित :

इस राजदंड को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 मई को सम्मानपूर्वक नए संसद परिसर में स्थापित करेंगे और यह सेंगोल, हमारे संविधान की भावना के अनुरूप समाजवादी, पंथनिरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य  तथा समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्रदान करने का नया प्रतीक बन जायेगा।

सेंगोल शब्द की उत्पत्ति :

‘सेंगोल’ शब्द का जन्म तमिल शब्द सेम्मई से हुआ है, जिसका अर्थ ‘सत्ता और न्याय’  अर्थात् न्यायिक सत्ता है। संसद की शान बनने वाला सेंगोल करीब पांच फीट का है और मूल रूप से चांदी का बना है तथा इस पर सोने का पानी/परत चढ़ी है।  राजदंड में सबसे ऊपर  ‘नंदी’ की खूबसूरत प्रतिकृति है, जो न्याय की अवधारणा का प्रतिनिधित्व करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका निर्माण 1947 में आजादी के समय कराया गया था ताकि अंग्रेज इसे सत्ता के प्रतीक के तौर पर देश की नई लोकतान्त्रिक सरकार को सौंप सके।  इसे तैयार कराने का विचार और अमली जामा पहनाने का काम विद्वान राजनयिक सी राजगोपालाचारी ने संभाला था।

सस्ता हस्तांरतरण का प्रतीक सेंगोल :

बताया जाता है कि 14 अगस्त, 1947 को तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रुप में अंतिम अंग्रेज शासक वायसराय लार्ड माउंटबेटन से प्राप्त किया था। तभी से यह सेंगोल या राजदंड भारत की विविधता और एक महान राष्ट्र के जन्म की एक प्रमुख धरोहर है। अभी तक यह प्रतीक इलाहाबाद के एक संग्रहालय में संरक्षित था पर जल्दी ही लोकसभा अध्यक्ष की आसंदी के पास आज़ादी के अमृत काल का राष्ट्रीय प्रतीक/गौरव बनकर लोकतंत्र की शोभा बढ़ाएगा ।

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