290 वर्ष पूर्व सन् 1711 में पुन: भगवान स्वयं जागेश्वर नाथ प्रकट हुए त्रेतायुग में बांदकपुर था तीर्थ स्थान

दमोह। विश्वविख्यात प्रशांत सिद्ध पीठ भारत वर्षान्तर्गत मध्यप्रदेश के जागेश्वर नाथ जी बांदकपुर 23 52′ अक्षांश एवं 70 35′ देशांश पर स्थित है। यह विशाल एवं प्राचीन मंदिर मध्यप्रदेश के जिला दमोह में मध्य रेल्वे की शाखा बीना कटनी लाइन की बांदकपुर रेल्वे स्टेशन से 2 कि.मी. की दूरी पर तथा दमोह जिला मुख्यालय से पूर्व दिशा में जागेश्वर धाम 17 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।

ऐसा माना जाता है त्रेता युग में भगवान राम की चित्रकूट यात्रा के पश्चात पंचवटी की दक्षिण यात्रा दमोह सागर के पास से हुई होगी, इसके प्रमाण मध्य प्रदेश इतिहास के लेख में पंडित गोरेलाल तिवारी और राय बहादुर हीरालाल ने दिए हैं। “बांदकपुरी जागेश्वर रहस्य’’ के रचयिता कवि भैरव प्रसाद जी बाजपेई, प्रकाशक श्री दुर्गा प्रसाद जी बाजपेई ने भी अपने “जागेश्वर रहस्य” में उक्त दोहा लिखा है।

दोहा में याहिमग हृकर गये, दंडकवन श्री राम।
यहाँ शम्भू पूजन कियो, अरू कीन्हों विश्राम॥

तत्र जागेश्वरं लिंग्ड़ श्री रामेण स्वपूजिता (स्कंद पुराण कुमारिका खंड) युग परिवर्तन से यह तीर्थ ध्वस्त हो गया तथा यह आज से 290 वर्ष पूर्व सन 1711 में पुन: भगवान स्वयं जागेश्वर नाथ प्रकट हुए। भगवान श्री जागेश्वर नाथ जी के स्वयं प्रकट होने के विषय में “बांदकपुरी जागेश्वर रहस्य” में लिखा गया है। ग्रंथ अनुसार स्पष्ट है कि त्रेतायुग में बांदकपुर तीर्थ स्थान था। कालान्तर में ध्वस्त हो गया तथा भगवान जागेश्वर नाथ जी ने धर्मेांत्थान हेतु पुनः प्रकट होना चाहा और सन 1711 में मराठा राज्य के दीवान श्री बालाजी राव चांदोरकर पर प्रसन्न होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए। कहा जाता है कि, “श्री बालाजी राव चांदोरकर का मुख्यालय दमोह था। आज भी आपके वंशज श्री के.पी. चांदोरकर प्राचार्य शासकीय उच्च विद्यालय माला बम्होरी जिला दमोह सपरिवार दमोह में निवास कर रहे हैं। श्री बालाजी राव अपने सेवकों के साथ अश्वारूढ़ होकर यहां आए और वर्तमान इमरती कुंड (प्राचीन काल में बावली थी) के समीप वटवृक्ष के तले आप श्री भगवान के पूजन में ध्यान मग्न हो गए।

ध्यान मग्न स्थिति में भगवान शिव जी ने आपको दर्शन दिए और कहा कि, “जहां पर तुम्हारा घोड़ा बंधा है, उसके पास उत्खनन करके मुझे भूमि से ऊपर लाने का प्रयत्न करो।‘’ ध्यान समाप्त होते ही आप देखते हैं कि घोड़ा हिन हिना रहा है तथा अपने पैरों से जमीन को खरोच रहा है। सेवकों से कहा कि, “देखो घोड़ा क्यों हिनहिना रहा है?” जब सेवकों ने देखा तो उनकी समझ में कुछ नहीं आया। बालाजी को अपने ध्यान अवस्था में शिव जी के द्वारा कहे हुए वचन याद आए तब आपने पूर्णरूपेण समझा की घोड़ा की टॉप के नीचे भगवान श्री जागेश्वर नाथ जी की ही यह ज्योतिर्लिंग दृष्टिगोचर हो रहा है। बालाजी राव ने सेवकों से उस स्थान की मिट्टी को अलग कराकर सफाई कराई तो वहां एक काले भूरे से प्रस्तर की अंडाकार मूर्ति निकल आई। कहा जाता है कि, “बालाजीराव ने उस शिवलिंग को ले जाना चाहा किंतु 30 फुट तक खुदाई करने पर भी ज्योतिर्लिंग का कहीं अनंत पाने पर खुदाई बंद कर दी गई। बालाजी ने अपने सेवकों सहित यही विश्राम किया।

रात्रि में भगवान शिव ने स्वप्न में श्री बालाजी से कहा कि “मैं यहीं पर रहकर चमत्कार दिखाने के लिए प्रकट हुआ हूं। अत: यही पर मंदिर निर्माण कर पूजन करो। श्री बालाजी ने फिर इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया तथा इसके पश्चात अन्य मंदिरों के निर्माण क्रमश: होते रहे।

दमोह सेटिलमेंट रिपोर्ट 1866 के अनुसार दमोह पर मराठों का अधिकार 1732 में हुआ। सन 1711 में बालाजी के स्वप्न की बात सत्य है, तो वह बालाजी, बालाजी गोविंद खेर अर्थात बालाजी दीवान के पितामह थे जो बालाजी राव पेशवा की सेना लेकर अपने पुत्र गोविंद पंत बुंदेला के साथ आए थे। इस क्षेत्र के पुराने निवासियों ने अपने पूर्वजों से जो सुना है उसके अनुसार 1711 में शंकर जी का मढ़ा बना। सन् 1742 में बालाजी दीवान ने शिव मंदिर बनवाया तथा सन 1772 में पार्वती माता का मंदिर बनवाया है।

बांदकपुर के संबंध में नवीनतम शोध दमोह नगर के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विनोद कुमार श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक “बांदकपुर एक विस्मृत तपोभूमि” में की है। उनके अनुसार “रामायण काल में रघुकुल मंत्री परिषद के सदस्य वामदेव जी का विंध्यांचल की उन उत्तरवाहिनी नदियों की शोध का कार्य सौंपा गया था, जो यमुना में मिलती थी। वे यहां इस सरोवर के मध्य शिवलिंग स्थापित कर आश्रम बनाए थे। जो वामोदक के नाम से जाना गया वाम अर्थात शिव। उदक अर्थात जल। उक्त कारण से वामोदक अर्थात बांदकपुर नाम इस ग्राम को मिला। बाद में वामोदक, वामादक, वामदक, बाम्दक होते-होते बांदक पुर हो गया। शिवलिंग अति विशाल था, इस कारण से शको और हूण के हमले के समय यहां के वाकाटक और भारशिव वंश के शासक इसे मिट्टी के ढीले ढ़ाँक कर चले गए। बांदकपुर ग्राम का नाम सदियों तक रिकॉर्ड में कायम रहा। बाद में मराठा सूबेदारों ने शिवलिंग का प्रकाव्य किया। सोए शिवलिंग को जगाकर नाम दिया “जागेश्वर।“

bandakpur-temple-damoh

बांदकपुर एक विस्मृत तपोभूमि पुस्तक के अनुसार भूमिगत शिव 5000 वर्ष पूर्व इस रूप में दृष्टव्य थे। उक्त जटिल संरचना के कारण ही मराठा दीवान उन्हें खोदकर निकाल नहीं पाए। मंदिर परिधि में प्रवेश हेतु मुख्य प्राचीन द्वार- दक्षिण में “हाथी दरवाजा” के नाम से प्रसिद्ध है। यात्री इसी हाथी दरवाजे से भगवान जागेश्वर नाथ जी के मंदिर प्रांगण में प्रवेश करते हैं। वर्तमान में सन 1981 में स्वर्गीय महेश जी के प्रयासों से नवीन द्वार पश्चिम में नवीन गेट के नाम से निर्मित किया गया है। जय श्री जायसवाल दमोह वालों के सहयोग से बनाया गया है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जी द्वारा दिनांक 11-1-1981 को उद्घाटन किया गया था। वर्तमान समय में यात्री यहीं से प्रवेश करते हैं। उत्तर दिशा में भी एक द्वार है। दक्षिण में हाथी दरवाजे से पश्चिम दिशा में भी एक द्वार था, इस द्वार से आदमी प्रवेश कर भगवान शंकर जी के मंदिर के पीछे से होकर जाते थे। श्री राधा कृष्ण मंदिर के निर्माण हो जाने के फलस्वरूप यह दरवाजा बंद हो गया है। दक्षिण दिशा में हाथी दरवाजे के पूर्व में दो दरवाजे हैं, यह निकास द्वार है। एक राम मंदिर के पीछे तथा दूसरा राम मंदिर के आगे हैं। उत्तर दिशा में भी तीन द्वार है। एक संस्कृत वेदांग विद्यालय के पीछे पश्चिम की ओर तथा दूसरा संस्कृत वेदांग विद्यालय में प्रवेश हेतु तथा तीसरा प्राचीन सोला के कुआँ को प्रवेश हेतु द्वार हैं। इस प्रकार संपूर्ण श्री मंदिर एवं अन्य भवन एक परकोटा के अंतर्गत निर्मित है।

बांदकपुर धाम में श्री जागेश्वर नाथ जी के मंदिर परिसर में ही माता जगत जननी पार्वती जी का मंदिर, नंदीमठ एवं साधु धूनी, श्री भैरव मंदिर, श्री राम मंदिर, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, श्री माता नर्मदा जी का मंदिर, राधा कृष्ण मंदिर, श्री माता दुर्गा जी का मंदिर, यज्ञ मंडप, इमरती कुंड (अमृत कुंड), संस्कृत वेदांग विद्यालय एवं छात्रावास, अन्य भवन, गोमुख, विवाह संस्कार शाला, धर्मशालाएं, रेन बसेरा और उद्यान भी बांदकपुर की शोभा बढ़ा रहे हैं। यहां भगवान जागेश्वरनाथ जी के चमत्कार भी सुनने में मिलते हैं।

बांदकपुर मंदिर समिति के प्रबंधक कृपाल पाठक बताते हैं यहां पर मकर संक्रांति पर्व,गणेश चतुर्थी, बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होलिकोत्सव, धुरेडी़ , रंग पंचमी, नवरात्रि जवारे, रामनवमी, शुक्ल पूर्णिमा, अक्षय तृतीया, वैशाख पूर्णिमा, गंगा दशहरा, वट सावित्री व्रत, रथ यात्रा, गुरु पूर्णिमा, नांग पंचमी, तुलसीदास जयंती, श्रावणी, रक्षाबंधन, संपूर्ण श्रावण मास, श्रावण सोमवार, कजलियां, हलषष्ठी, श्री कृष्ण जन्मोत्सव, दधि कांदोत्सव , हरतालिका व्रत, गणेश व्रत, ऋषि पंचमी, अनंत चतुर्दशी, महालक्ष्मी व्रत, विजयादशमी, शरद पूर्णिमा, धन्वंतरी पूजन, नरक चतुर्दशी, दीपावली, अन्नकूट, देवउठनी एकादशी, कालिदास जयंती, बैकुंठ चतुर्दशी आदि विशेष पर्व मनाये जाते हैं, बांदकपुर धाम में भगवान जागेश्वरनाथ जी के दर्शन हेतु बड़ी दूर-दूर से श्रद्धालुजन आते हैं। यहां मेला त्यौहारों पर मेला भी लगता है।

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