दमोह: शहर की आस्था का केंद्र है बड़ी देवी मंदिर यहां विराजमान है महालक्ष्मी, सरस्वती और महाकाली, पढ़ें मंदिर का इतिहास!

 

badi devi mandir damoh


दमोह की बड़ी देवी मंदिर। शक्ति की भक्ति का महा पर्व शारदीय नवरात्र आज से शुरू हो चुका है। शहर के प्रसिद्ध बड़ी देवी मंदिर में शनिवार को अलसुबह से ही मां जगतजननी के समक्ष अपना माथा टेककर मनोकामनाए आशीर्वाद मांग रहें हैं। प्रसिद्ध बड़ीदेवी माता मंदिर में मां के दर्शन तो भक्त वर्षों से करते आ रहे हैं, लेकिन मंदिर के रहस्यों के बारे में अधिकांश भक्त नहीं जानते हैं।


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 कोरोना संकट से पूर्व ही छवि


400 साल पुराना है इस मंदिर का इतिहास:


बड़ी देवी मंदिर में  महालक्ष्मी, सरस्वती और महाकाली प्रतिमाएं करीब 4 सौ साल से ज्यादा पुरानी हैं, यह प्रतिमाएं यूपी के कानपुर के कटहरा गांव से हजारी परिवार दमोह लेकर आये थे परिवार के लोगों ने ही मंदिर में प्रतिमाओं की स्थापना की थी। यह देवियां हजारी परिवार की कुलदेवी भी हैं।

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करीब पांच एकड़ क्षेत्र में फैले माता के मंदिर की खास बात यह है की यहां पर जिले से दूर-दूर से लोग दर्शन करने आते हैं। पूरा सिद्धक्षेत्र शांत भाव वाला है। यहां पर आने पर ही श्रद्धालु को शांतिपूर्ण माहौल मिलता है। 9 दिन तक मंदिर से शहर तक तक लाइटिंग और सुरक्षा का इंतजाम किया जाता है। ताकि श्रद्धालु को किसी भी तरह की परेशानी ना हो सकें।


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हर किसी की मनोकामना पूर्ण करती हैं मां:


आपको बता दें की हजारी परिवार की कुलदेवी के सामने जिस किसी ने भी अपनी मनोकामना रखी हैं। मां जगतजननी ने उसकी हर इच्छा पूरी की है। कुछ ही समय में लोग हजारी परिवार की कुलदेवी को बड़ी देवी कहने लगे और लोग इस मंदिर को बड़ी देवी के मंदिर के नाम से जानने लगे। जो अब देश भर में प्रसिद्ध तीर्थ बड़ी देवी के नाम से प्रचलित है। पूर्व में बड़ी खेरमाई और बगीचा वाली माई के नाम से भी लोग यहां माता के दर्शन करने पहुंचते थे नवरात्र के दिनों में यह स्थान देवी मां के जीवंत स्थान के रूप में निर्मित हो जाता है. यहां पर अखंड कीर्तन, अखंड ज्योति, ओर अखंड लोगों का आना जाना यहां पर लोगों की बड़ी आस्था और विश्वास को प्रकट करता है।

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मंदिर बनाने का प्रयास हो गया था असफल:


यहां के पूर्वजों के अनुसार करीब दो सौ वर्ष पूर्व छपरट वाले ठाकुर साहब ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर बड़ीदेवी मंदिर बनाने का प्रयास किया था, लेकिन मंदिर का गुबंद क्षतिग्रस्त होने के बाद काम रोक दिया गया था। जिसके बाद 1979 में शहर के बाबूलाल गुप्ता ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। अब नया रूप मंदिर को दिया जा रहा है। जिसके लिए लोग खुलकर दान कर रहे है।


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