दमोह उपचुनाव में जातिगत समीकरण साधने में जुटे राजनीतिक दल

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दमोह। Damoh Assembly By-Election: दमोह विधानसभा उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस जातिगत समीकरण बैठाने पर ज्यादा जोर लगा रहे हैं, हालाकि जिले की चार विधानसभा सीटों में से तीन पर भले ही जातिगत समीकरण काम करते हाें, लेकिन दमोह सीट (Damoh Seat) पर जातिवाद उतना हावी नहीं रहा है, नतीजे भी हमेशा इसके उल्ट ही रहें हैं। अगर इसके इतिहास पर प्रकाश डालें तो यहां पर कभी भी कोई प्रत्याशी (Candidate) जातिगत समीकरण के आधार पर नहीं जीता।


इस क्षेत्र में जाति ज्यादा मायने नहीं रखती है, प्रत्याशी का चेहरा ही सबकुछ होता है,पथरिया हटा और जबेरा में हर बार जातिगत आधार पर टिकट दिया जाता है, हर पार्टियां ही इसी को आधार मानकर टिकट देती हैं, लेकिन दमोह सीट पर इससे इतर होकर पाटिर्याें को निर्णय लेना होता है। अगर दमोह विधानसभा सीट पर जातिगत समीकरण (Caste equation) का गणित देखा जाए तो।


पुरूषों की संख्या: 1,21519 हैं

वहीं महिलाओं की संख्या: 1,11,963 हैं।

कुल वोटरों की संख्या: 2,33,492 है।


वहीं जातिगत समीकरण देखा जाए तो:


तो इस सीट पर जैन 15 हजार, ब्राहम्ण 12 हजार, मुस्लिम 18 हजार, दलित 46 हजार, कायस्थ 12 हजार, राजपूत 8 हजार, लोधी 38 हजार 500, क्रिश्चियन 5 हजार, यादव 18 हजार, कुर्मी 12 हजार, काछी 12 हजार, यादव 10 हज़ार, रैकवार 8 हजार, सेन 8 हजार मतदाता निणार्यक भूमिका में होते हैं। वहीं चौरसिया आसाटी, नेमा,सिंधी, सिख समाज के वोटर भी शामिल हैं।


मगर इनका विधायक नहीं होता है। पार्टी हाईकमान ही जातिगत आधार पर ही टिकट देता है, मगर वह आकड़ा भी काम नहीं कर सकता, प्रत्याशी कि व्यक्तिगत छवि ही काम कर पाई है।


दमोह में हारा जातिवाद:


1951 एचएल मरोठी


1957 एचएल मरोठी


1962 आनंद श्रीवास्तव


1967 पीएन टंडन


1972 आनंद श्रीवास्तव


1977 पीएन टंडन


1980 चंद्रनारायण टंडन


1984 जयंत मलैया


1985 मुकेश नायक


1990 जयंत मलैया


1993 जयंत मलैया


1998 जयंत मलैया


2003 जयंत मलैया


2008 जयंत मलैया


2013 जयंत मलैया


आपको बता दें कि 1984 में जयंत मलैया, तो 1985 में मुकेश नायक और 1990 से 2013 तक लगातार जयंत मलैया दमोह विधानसभा से विधायक रहे हैं, वहीं आनंद श्रीवास्तव और टंडन परिवार जितनी बार भी इस सीट से विजय हुए हैं, उस समय उनके समाज का वोटो का गणित सिर्फ दो से तीन फीसदी ही था। 1985 और 1990 से 2013 तक मुकेश नायक और जयंत मलैया जब-जब जीते, तब उस समय उनके समाज के वोटों का प्रतिशत 5 से 10 के बीच ही रहा है, इससे साफ होता हैं कि सिर्फ जाति के दम पर चुनाव जीतना संभव नहीं है, आज के वर्धमान समय में वोटर मुद्दों पर ज्यादा फोकस करता हैं।

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